नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 200 में प्रयुक्त शब्द “जितनी जल्दी संभव हो” (as soon as possible) बेअर्थ हो जाएंगे, यदि राज्यपाल विधानसभा से पारित विधेयकों पर अनंतकाल तक अपनी स्वीकृति रोके रखते हैं। अदालत ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर छह हफ्ते की समयसीमा को हटाकर इस शब्द का उपयोग किया था, ताकि गवर्नर तत्काल निर्णय लें।
मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने केंद्र से पूछा कि क्या इस प्रावधान की अनदेखी की जा सकती है? अनुच्छेद 200 राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि वे विधानसभा से पारित विधेयक को मंजूरी दें, रोकें, पुनर्विचार हेतु लौटाएं या राष्ट्रपति के पास भेजें। हालांकि, शर्त यह है कि यदि विधानसभा पुनर्विचार के बाद विधेयक फिर से भेजती है तो गवर्नर को अनिवार्य रूप से सहमति देनी होगी।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी (तमिलनाडु की ओर से) ने दलील दी कि यदि गवर्नरों को धन विधेयक (Money Bill) तक पर रोक का अधिकार मिल जाए, तो वे “सुपर मुख्यमंत्री” बन जाएंगे। उन्होंने कहा कि किसी बिल को स्थायी रूप से रोकना अनुच्छेद 200 का मजाक उड़ाना होगा।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्यों को राष्ट्रपति या गवर्नर के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट नहीं जाना चाहिए, बल्कि राजनीतिक स्तर पर समाधान तलाशना चाहिए या अनुच्छेद 131 के तहत मुकदमा दायर करना चाहिए। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका गवर्नरों या राष्ट्रपति पर समय-सीमा तय करने का दबाव नहीं डाल सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि अदालत खुद किसी मामले को 10 साल तक लंबित रखे, तो क्या राष्ट्रपति आदेश जारी कर सकते हैं? संविधान निर्माताओं का आशय था कि गवर्नर केंद्र और राज्य के बीच सेतु हों, न कि निर्वाचित सरकार के समानांतर शक्ति।”
सिंघवी ने संविधान सभा की बहसों का हवाला देते हुए कहा कि गवर्नर और राष्ट्रपति “केवल औपचारिक पद” हैं और उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधा होना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि गवर्नर को असीमित विवेकाधिकार देना संवैधानिक ढांचे में अराजकता पैदा करेगा।
Author: News Desk
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