भारतीय राजनीति में “वोट चोरी” का आरोप नया नहीं है। तीन दशक पहले जब पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के 13 कार्यकर्ता मारे गए थे, तब ममता बनर्जी खुद पुलिस की मार झेल चुकी थीं। उन्हें राइटर्स बिल्डिंग से घसीटकर बाहर निकाला गया था और गंभीर चोटें आई थीं। एक अन्य घटना में उन्होंने एक बलात्कार पीड़िता के साथ मुख्यमंत्री आवास के बाहर धरना दिया था, जहां उन्हें घेरकर अपमानित किया गया।
तीन दशक बाद वही आरोप एक बार फिर लौटे हैं — अब नाम है “वोट चोरी” और संदर्भ है चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया। फर्क आरोप का नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया के तरीके का है। यही अंतर बिहार में राहुल गांधी के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीति को अलग-अलग खड़ा करता है।
बिहार: नारे उठे, लेकिन आंदोलन नहीं बना
बिहार विधानसभा चुनावों से पहले राहुल गांधी ने वोटर अधिकार यात्रा शुरू की। शुरुआत में इसका असर दिखा। “Vote chor, gaddi chhod” जैसे नारे गूंजे और कुछ समय के लिए लगा कि विपक्ष को जातीय गणित से अलग एक मजबूत मुद्दा मिल गया है।
इसके बाद राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में तथाकथित “H-Files” जारी कर चुनाव आयोग पर एनडीए के पक्ष में काम करने का आरोप लगाया। सुर्खियां बनीं, बहसें हुईं, लेकिन जमीनी आंदोलन खड़ा नहीं हो सका।
सबसे अहम चरण में राहुल गांधी का बिहार से लगभग गायब हो जाना विपक्ष को भारी पड़ा। न रैलियां, न रोड शो, न वर्चुअल मौजूदगी। नतीजा यह हुआ कि “वोट चोरी” का मुद्दा टीवी स्टूडियो और सोशल मीडिया तक सिमट गया। चुनाव परिणामों में कांग्रेस का प्रदर्शन कमजोर रहा।
बंगाल मॉडल: आरोप नहीं, टकराव
पश्चिम बंगाल में तस्वीर बिल्कुल अलग है। यहां ममता बनर्जी ने “वोट चोरी” को प्रेस बयान नहीं, बल्कि सड़क की लड़ाई बना दिया है।
9 जनवरी 2026 को जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोलकाता में I-PAC के दफ्तर पर छापा मारा, ममता खुद मौके पर पहुंच गईं। केंद्रीय बलों के सामने अंदर जाकर उन्होंने छापे को SIR से जोड़ा और आरोप लगाया कि पार्टी की चुनावी रणनीति हासिल करने की कोशिश हो रही है।
उन्होंने खुलेआम सवाल किया—
“क्या ED या अमित शाह का काम है पार्टी का हार्ड डिस्क और उम्मीदवारों की लिस्ट लेना?”
ED ने बाद में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन ममता ने इन आरोपों से इनकार किया।
पुराना पैटर्न, नई रणनीति
यह पहली बार नहीं है। 2021 में नारदा केस हो या 2006 का सिंगूर आंदोलन—ममता हर बार खुद मैदान में उतरी हैं। 26 दिन का अनशन, हाईवे जाम, CBI दफ्तर में घंटों बैठना—उनकी राजनीति का केंद्र हमेशा “मौजूदगी” रही है।
2026 की तैयारी में भी यही मॉडल दिख रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल भर में “May I Help You” कैंप लगाए, जहां SIR प्रक्रिया में मतदाताओं की मदद की जा रही है। ममता ने खुद को “संरक्षक” के रूप में पेश किया—न डिटेंशन कैंप, न किसी असली वोटर को बाहर जाने दिया जाएगा।
उन्होंने इसे सिर्फ वोट नहीं, पहचान की लड़ाई बताया। नाम की वर्तनी, जन्मतिथि, दस्तावेज़—हर उदाहरण को हास्य, इतिहास और भावनाओं से जोड़ा। “रवींद्रनाथ ठाकुर और टैगोर” से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक के किस्सों ने मुद्दे को आम लोगों से जोड़ दिया।
दो राज्य, दो रास्ते
बिहार में “Vote Chori Politics” मंच और माइक्रोफोन तक सीमित रही। पश्चिम बंगाल में वही मुद्दा सड़क, दफ्तर और मोहल्ले तक पहुंचा।
चुनावी नतीजे क्या होंगे, यह तो मतदाता तय करेंगे। लेकिन इतना साफ है कि जहां राहुल गांधी की राजनीति यात्रा और बयानबाजी तक सिमटती दिखी, वहीं ममता बनर्जी की राजनीति आज भी सीधे सड़क से ताकत लेती नजर आ रही है।
Author: News Desk
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