Lachit Barphukan History Controversy के बीच असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाई स्कूल स्तर की इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने अहोम योद्धा बाघ हज़ारिका की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि स्कूल की किताबों में दी गई जानकारी ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाती।
शुक्रवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में मुख्यमंत्री सरमा ने कहा, “हमने हाई स्कूल की इतिहास की किताबों को दोबारा लिखने का फैसला किया है और इस बारे में शिक्षा मंत्री रानोझ पेगू को निर्देश दे दिए गए हैं।”
बाघ हज़ारिका की भूमिका पर सवाल
मुख्यमंत्री ने दावा किया कि बाघ हज़ारिका ने 1671 की सरायघाट की लड़ाई में अहोम सेनापति लाचित बरफुकन के साथ मुगलों के खिलाफ युद्ध नहीं किया था। उन्होंने कहा,
“सरायघाट की लड़ाई में लाचित बरफुकन के साथ कोई बाघ हज़ारिका नहीं था। मुगलों के खिलाफ कामरूप में मिरी हांडिके नामक मISING नेता ने लड़ाई लड़ी थी।”
यह बयान उन्होंने तक़ाम मिसिंग पोरिन केबांग (ऑल मिसिंग स्टूडेंट्स यूनियन) द्वारा आयोजित 10वें मिसिंग यूथ फेस्टिवल के समापन समारोह में दिया।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण और विवाद
इतिहासकारों के अनुसार, इस्माइल सिद्दीकी, जिन्हें बाघ हज़ारिका के नाम से जाना जाता है, 17वीं सदी के एक योद्धा थे जिन्होंने लाचित बरफुकन के नेतृत्व में मुगलों के खिलाफ सरायघाट की लड़ाई लड़ी थी। माना जाता है कि उनका जन्म वर्तमान शिवसागर ज़िले के धेकेरीगांव गांव में एक असमिया मुस्लिम परिवार में हुआ था।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और समुदायों पर बयान
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब असम में मुस्लिम समुदायों को लेकर राजनीतिक तनाव बढ़ा हुआ है। मुख्यमंत्री और राज्य बीजेपी नेतृत्व लगातार ‘स्वदेशी मुस्लिम’ और बंगाली-भाषी ‘मिया’ मुसलमानों के बीच फर्क करते रहे हैं।
हाल ही में सरमा ने ‘मिया’ समुदाय को लेकर कड़े बयान दिए थे, जिनकी काफी आलोचना हुई। ‘मिया’ शब्द असम में आमतौर पर बंगाली-भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इसे कई बार अपमानजनक माना जाता है।
मिसिंग समुदाय की प्रशंसा और घोषणाएं
मुख्यमंत्री ने मिसिंग समुदाय की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने अपर असम की रक्षा में अहम योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर पूरे असम में मिसिंग समुदाय होता, तो अवैध घुसपैठ की समस्या ही नहीं होती।
इस अवसर पर सरमा ने मिसिंग यूथ फेस्टिवल के लिए 100 करोड़ रुपये की सहायता और डोनी-पोलो समाज के उत्थान के लिए 10 करोड़ रुपये की अनुदान राशि देने की भी घोषणा की।
इतिहास की किताबों में प्रस्तावित बदलाव और लाचित बरफुकन से जुड़े इस विवाद को लेकर असम की राजनीति और अकादमिक जगत में बहस और तेज़ होने की संभावना है।
Author: News Desk
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