एक समय था जब भारत का केंद्रीय बजट आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को सीधे प्रभावित करता था। आज ऐसा नहीं है। फिर भी, आदतों के गुलाम हम हर बजट वाले दिन उसी उत्साह से उसे देखते हैं, जैसे बिना बुलाए किसी शादी में ढोल की आवाज़ सुनकर नाचने लगें।
“बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना” वाली कहावत आज के बजट दिवस पर बिल्कुल सटीक बैठती है। कभी इस शादी में खाने को कुछ मिल जाता था—रेल किराया, टैक्स में बदलाव, रोज़मर्रा की चीज़ों की कीमतें। लेकिन अब न तो हम भूखे हैं और न ही बजट हमें कोई नया स्वाद देता है। फिर भी, ढोल दिखते ही हम झूमने लगते हैं।
वित्त मंत्री हर साल संसद में देश को बताती हैं कि सरकार एक साल में कितना पैसा इकट्ठा करेगी, कितना उधार लेगी और कहां खर्च करेगी। हम भाषण सुनते हैं और फिर पूरे साल देखते हैं कि वह पैसा कैसे खर्च या बर्बाद होता है।
एक ज़माना था जब रेल बजट अलग पेश होता था। तब रेल ही लंबी दूरी की जीवनरेखा थी। सड़कों की हालत खराब थी और हवाई यात्रा अमीरों की शान। इसलिए किसी नए स्टेशन या ट्रेन की घोषणा किसी त्योहार से कम नहीं लगती थी। आज रेल बजट भी मुख्य बजट में समा चुका है, जैसे जीएसटी ने बाकी टैक्स निगल लिए। सैलरी पाने वालों पर टैक्स का बोझ धीरे-धीरे बढ़ता ही जाता है, कभी-कभार चुनावी मौसम में थोड़ी राहत दी जाती है।
असल में, राष्ट्रीय बजट अब पड़ोसी के घरेलू बजट जैसा हो गया है—देखने में जिज्ञासा, लेकिन कुछ देर में ऊब। यह उबाऊ नहीं हुआ है, बल्कि उतना ही असरहीन हो गया है जितना होना चाहिए। यह अब वह डोपामिन नहीं देता, क्योंकि हम उससे आज़ाद हो चुके हैं।
कुछ लोग अब भी कहते हैं कि सरकार हमारे पैसों का हिसाब हमें जानने का हक़ है। लेकिन सच्चाई यह है कि टैक्स कोई चंदा नहीं है, जिसे न देने का विकल्प हो। एक बार पैसा चला गया, वह सरकार का हो गया।
आज के बजट में सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, 12.2 लाख करोड़ रुपये का कैपेक्स, एआई को ग्रोथ मल्टीप्लायर और युवा शक्ति की तारीफ—सब कुछ है। लेकिन भीड़ भरी सेकंड क्लास में सफर करने वाले यात्री, नौकरी की तलाश में भटकते युवा और टैक्स से परेशान मिडिल क्लास के लिए कुछ खास नहीं बदला।
कैंसर की दवाएं सस्ती हुईं, लेकिन प्रदूषण जस का तस है। क्रिएटर स्कीम आएंगी, शायद रील्स ज़्यादा बनेंगी, रियल नौकरियां कम।
बजट के बाद वही पुरानी कहानी—सरकारी समर्थक तारीफ करेंगे, विपक्ष हर वर्ग के खिलाफ बताएगा, बाज़ार थोड़ी देर गिरेगा, और आम आदमी कंधे उचकाकर आगे बढ़ जाएगा। अगले दिन ज़िंदगी वही रहेगी। बजट की चर्चा खत्म हो जाएगी।
Author: News Desk
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