बांग्लादेश में BNP की चुनावी जीत के बाद तारीक रहमान के प्रधानमंत्री बनने की राह लगभग साफ मानी जा रही है। लंबे समय तक निर्वासन में रहने के बाद उनकी वापसी ने राजनीति में नई दिशा दी है। सवाल यह है कि Tarique Rahman 2.0 and India Relations किस ओर बढ़ेंगे और इसका असर भारत तथा बांग्लादेश के हिंदू समुदाय पर क्या होगा?
भारत के लिए क्या संकेत?
भारत ने चुनाव परिणामों से पहले ही तारीक को बधाई देकर यह संकेत दे दिया कि वह रिश्तों को रीसेट करना चाहता है। 4,000 किमी लंबी सीमा, व्यापार, बिजली आपूर्ति और कनेक्टिविटी—इन सब कारणों से दोनों देश एक-दूसरे के लिए अनिवार्य हैं।
हालांकि चुनौतियाँ भी हैं:
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शेख हसीना के भारत में रहने का मुद्दा
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तीस्ता जल बंटवारा समझौता
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सीमा पर गोलीबारी और अवैध आव्रजन का प्रश्न
तारीक ने “Bangladesh First” की नीति की बात की है और भारत, चीन व पाकिस्तान से समान दूरी रखने का संकेत दिया है। यह संतुलन साधना भारत के लिए अवसर भी है और परीक्षा भी।
बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए क्या बदलेगा?
हाल के वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा और हिंदू समुदाय पर हमलों ने चिंता बढ़ाई है। हिंदू आबादी बांग्लादेश में लगभग 8% है। तारीक ने अपने शुरुआती भाषणों में “सुरक्षित और समावेशी बांग्लादेश” का वादा किया और कहा कि “धर्म व्यक्तिगत है, लेकिन राज्य सबका है।”
यदि यह वादा जमीन पर उतरता है, तो हिंदू समुदाय को सुरक्षा और राजनीतिक आश्वासन मिल सकता है। लेकिन अतीत में BNP सरकार के दौरान कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव को देखते हुए निगरानी जरूरी रहेगी।
अतीत की परछाई
2001–2006 के BNP शासनकाल में भारत-बांग्लादेश संबंध तनावपूर्ण रहे थे। भारत ने उस समय पूर्वोत्तर उग्रवादियों को पनाह देने के आरोप लगाए थे। 2004 के चिटगांव हथियार कांड में भी तारीक का नाम सामने आया था, हालांकि बाद में उन्हें बरी कर दिया गया।
यही अतीत “डार्क प्रिंस” की छवि से जुड़ा रहा है। अब तारीक 2.0 खुद को एक व्यवहारिक और सुधारवादी नेता के रूप में पेश कर रहे हैं।
Author: News Desk
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